
Modern History Notes in Hindi – आधुनिक भारत का इतिहास
आधुनिक भारत का इतिहास सरल और संक्षिप्त हिंदी नोट्स में पढ़ें। इस लेख में यूरोपीय शक्तियों के आगमन, ब्रिटिश सत्ता की स्थापना, प्रमुख युद्धों, गवर्नर-जनरल, सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों, 1857 की क्रांति और भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्यों को प्रतियोगी परीक्षाओं की दृष्टि से समझाया गया है।
Modern History Notes in Hindi प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए भारतीय इतिहास का एक महत्वपूर्ण विषय है। आधुनिक भारतीय इतिहास में यूरोपीय व्यापारिक कंपनियों के आगमन से लेकर ब्रिटिश शासन की स्थापना, 1857 के विद्रोह, सामाजिक एवं धार्मिक सुधार आंदोलनों और भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन तक की प्रमुख घटनाओं का अध्ययन किया जाता है।
SSC, Railway, UPSC, State PSC तथा अन्य सरकारी परीक्षाओं में आधुनिक इतिहास से प्रमुख व्यक्तियों, युद्धों, अधिनियमों, कांग्रेस अधिवेशनों, आंदोलनों और महत्वपूर्ण तिथियों पर प्रश्न पूछे जाते हैं। इसलिए इस लेख में विषयों को क्रमबद्ध, संक्षिप्त और परीक्षा-उपयोगी तरीके से प्रस्तुत किया गया है।
भारत में यूरोपीय शक्तियों का आगमन
15वीं शताब्दी के अंत से यूरोपीय व्यापारिक शक्तियों ने भारत के साथ प्रत्यक्ष समुद्री व्यापार स्थापित करना शुरू किया। भारत के मसाले, वस्त्र और अन्य व्यापारिक वस्तुएं यूरोपीय व्यापारियों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र थीं।
भारत आने वाली प्रमुख यूरोपीय शक्तियों में पुर्तगाली, डच, अंग्रेज और फ्रांसीसी शामिल थे। इनके बीच व्यापारिक प्रतिस्पर्धा धीरे-धीरे राजनीतिक और सैन्य संघर्ष में बदल गई।
पुर्तगालियों का आगमन
समुद्री मार्ग से भारत पहुंचने वाला प्रसिद्ध पुर्तगाली नाविक वास्को-दा-गामा था। वह 1498 ई. में भारत के पश्चिमी तट पर स्थित कालीकट पहुंचा।
इसके बाद पुर्तगालियों ने भारत के पश्चिमी तट पर अपने व्यापारिक केंद्र स्थापित किए। अल्फांसो डी अल्बुकर्क के नेतृत्व में पुर्तगालियों ने 1510 ई. में गोवा पर अधिकार स्थापित किया।
डचों का आगमन
डच व्यापारियों ने भी भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया के मसाला व्यापार में भाग लिया। डच ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना 1602 ई. में हुई। भारत में उनके प्रमुख व्यापारिक केंद्रों में पुलिकट और नागपट्टनम शामिल थे।
समय के साथ डचों का मुख्य ध्यान भारत की तुलना में दक्षिण-पूर्व एशिया के मसाला व्यापार पर अधिक केंद्रित हो गया।
अंग्रेजों का आगमन
English East India Company की स्थापना 1600 ई. में हुई। कंपनी को इंग्लैंड की महारानी एलिजाबेथ प्रथम से पूर्वी देशों के साथ व्यापार करने के लिए चार्टर प्राप्त हुआ।
17वीं शताब्दी के दौरान अंग्रेजों ने भारत के विभिन्न भागों में व्यापारिक केंद्र स्थापित किए। सूरत पश्चिमी भारत में अंग्रेजों का एक महत्वपूर्ण प्रारंभिक व्यापारिक केंद्र बना।
फ्रांसीसियों का आगमन
French East India Company की स्थापना 1664 ई. में हुई। भारत में फ्रांसीसियों का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र पांडिचेरी था। चंद्रनगर, माहे और कराईकल भी उनके प्रमुख केंद्रों में शामिल थे।
| यूरोपीय शक्ति | महत्वपूर्ण तथ्य |
|---|---|
| पुर्तगाली | वास्को-दा-गामा 1498 ई. में कालीकट पहुंचा |
| डच | डच ईस्ट इंडिया कंपनी – 1602 ई. |
| अंग्रेज | ईस्ट इंडिया कंपनी – 1600 ई. |
| फ्रांसीसी | फ्रेंच ईस्ट इंडिया कंपनी – 1664 ई. |
- वास्को-दा-गामा 1498 ई. में कालीकट पहुंचा।
- पुर्तगालियों ने 1510 ई. में गोवा पर अधिकार किया।
- English East India Company की स्थापना 1600 ई. में हुई।
- Dutch East India Company की स्थापना 1602 ई. में हुई।
- French East India Company की स्थापना 1664 ई. में हुई।
- भारत में फ्रांसीसियों का प्रमुख केंद्र पांडिचेरी था।
1498 → वास्को-दा-गामा | 1600 → English East India Company | 1602 → Dutch East India Company | 1664 → French East India Company
कर्नाटक युद्ध
18वीं शताब्दी में दक्षिण भारत में अंग्रेजों और फ्रांसीसियों के बीच राजनीतिक एवं व्यापारिक प्रभुत्व स्थापित करने के लिए संघर्ष हुआ। इन संघर्षों को सामान्यतः कर्नाटक युद्ध (Carnatic Wars) कहा जाता है।
कुल तीन कर्नाटक युद्ध हुए। इन युद्धों के बाद भारत में फ्रांसीसी राजनीतिक प्रभाव कमजोर हुआ और अंग्रेजों की स्थिति अधिक मजबूत हो गई।
| युद्ध | अवधि |
|---|---|
| प्रथम कर्नाटक युद्ध | 1746–1748 ई. |
| द्वितीय कर्नाटक युद्ध | 1749–1754 ई. |
| तृतीय कर्नाटक युद्ध | 1756–1763 ई. |
वांडीवाश का युद्ध
वांडीवाश का युद्ध 1760 ई. में अंग्रेजों और फ्रांसीसियों के बीच लड़ा गया। इस युद्ध में अंग्रेजों ने फ्रांसीसी सेना को पराजित किया।
वांडीवाश की विजय के बाद भारत में अंग्रेजों के मुकाबले फ्रांसीसियों की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को गंभीर आघात पहुंचा। इस कारण यह आधुनिक भारतीय इतिहास की महत्वपूर्ण घटनाओं में गिना जाता है।
- कर्नाटक युद्ध मुख्य रूप से अंग्रेजों और फ्रांसीसियों के बीच हुए।
- कुल तीन कर्नाटक युद्ध हुए।
- वांडीवाश का युद्ध 1760 ई. में हुआ।
- वांडीवाश के युद्ध में अंग्रेजों ने फ्रांसीसियों को पराजित किया।
भारत में अंग्रेजी सत्ता की स्थापना
अंग्रेज भारत में प्रारंभ में व्यापार के उद्देश्य से आए थे, लेकिन 18वीं शताब्दी में मुगल सत्ता के कमजोर होने और क्षेत्रीय राज्यों के बीच राजनीतिक संघर्ष का लाभ उठाकर ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारतीय राजनीति में हस्तक्षेप बढ़ाना शुरू किया।
बंगाल भारत के सबसे समृद्ध क्षेत्रों में से एक था। इसलिए बंगाल पर राजनीतिक और आर्थिक नियंत्रण स्थापित करना ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण था।
सिराजुद्दौला और अंग्रेज
सिराजुद्दौला 1756 ई. में बंगाल का नवाब बना। अंग्रेजों और नवाब के बीच किलेबंदी, व्यापारिक विशेषाधिकारों और राजनीतिक हस्तक्षेप जैसे मुद्दों को लेकर तनाव बढ़ गया।
यह संघर्ष अंततः 1757 ई. के प्लासी के युद्ध में बदल गया, जिसने भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के राजनीतिक उत्थान में निर्णायक भूमिका निभाई।
प्लासी और बक्सर का युद्ध
प्लासी और बक्सर के युद्ध आधुनिक भारतीय इतिहास की दो अत्यंत महत्वपूर्ण घटनाएं हैं। इन युद्धों ने बंगाल में ईस्ट इंडिया कंपनी की राजनीतिक और आर्थिक शक्ति को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
प्लासी का युद्ध – 1757
प्लासी का युद्ध 23 जून 1757 ई. को बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला और ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना के बीच लड़ा गया। कंपनी की सेना का नेतृत्व रॉबर्ट क्लाइव कर रहा था।
सिराजुद्दौला के सेनापति मीर जाफर और कुछ अन्य प्रभावशाली व्यक्तियों की साजिश तथा निष्क्रियता ने नवाब की स्थिति को कमजोर कर दिया। सिराजुद्दौला की पराजय के बाद मीर जाफर को बंगाल का नवाब बनाया गया।
बक्सर का युद्ध – 1764
बक्सर का युद्ध 1764 ई. में ईस्ट इंडिया कंपनी और भारतीय शासकों की संयुक्त सेना के बीच लड़ा गया। संयुक्त पक्ष में बंगाल के पूर्व नवाब मीर कासिम, अवध के नवाब शुजाउद्दौला और मुगल सम्राट शाह आलम द्वितीय शामिल थे।
ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना का नेतृत्व हेक्टर मुनरो ने किया। युद्ध में कंपनी की विजय हुई, जिससे बंगाल और आसपास के क्षेत्रों में उसकी राजनीतिक स्थिति और मजबूत हो गई।
इलाहाबाद की संधि और दीवानी अधिकार
बक्सर की विजय के बाद 1765 ई. में हुई व्यवस्थाओं के तहत मुगल सम्राट शाह आलम द्वितीय ने ईस्ट इंडिया कंपनी को बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी प्रदान की। इससे कंपनी को इन क्षेत्रों में राजस्व वसूली का अधिकार मिला।
| प्लासी का युद्ध | बक्सर का युद्ध |
|---|---|
| 1757 ई. | 1764 ई. |
| सिराजुद्दौला बनाम कंपनी | मीर कासिम + शुजाउद्दौला + शाह आलम II बनाम कंपनी |
| रॉबर्ट क्लाइव | हेक्टर मुनरो |
| बंगाल में कंपनी के राजनीतिक प्रभाव का विस्तार | कंपनी की राजनीतिक एवं राजस्व शक्ति और मजबूत हुई |
1757 → प्लासी
1764 → बक्सर
1765 → बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी
- प्लासी का युद्ध 1757 ई. में हुआ।
- प्लासी में सिराजुद्दौला का मुकाबला ईस्ट इंडिया कंपनी से हुआ।
- कंपनी की ओर से रॉबर्ट क्लाइव ने नेतृत्व किया।
- बक्सर का युद्ध 1764 ई. में हुआ।
- बक्सर में कंपनी की सेना का नेतृत्व हेक्टर मुनरो ने किया।
- 1765 ई. में कंपनी को बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी मिली।
प्लासी → 1757 → सिराजुद्दौला → रॉबर्ट क्लाइव | बक्सर → 1764 → हेक्टर मुनरो | दीवानी → 1765
बंगाल में द्वैध शासन
1765 ई. में ईस्ट इंडिया कंपनी को बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी मिलने के बाद रॉबर्ट क्लाइव ने बंगाल में द्वैध शासन (Dual Government) की व्यवस्था लागू की। इसमें राजस्व वसूली का वास्तविक नियंत्रण कंपनी के पास था, जबकि प्रशासन की जिम्मेदारी नवाब के नाम पर बनी रही।
इस व्यवस्था में अधिकार और उत्तरदायित्व अलग-अलग होने के कारण प्रशासनिक समस्याएं बढ़ीं। 1772 ई. में वारेन हेस्टिंग्स ने बंगाल में द्वैध शासन समाप्त कर दिया।
रेग्युलेटिंग एक्ट 1773
ईस्ट इंडिया कंपनी की बढ़ती राजनीतिक शक्ति और उसके प्रशासन पर नियंत्रण स्थापित करने के उद्देश्य से ब्रिटिश संसद ने रेग्युलेटिंग एक्ट 1773 पारित किया। यह भारत में कंपनी के शासन को ब्रिटिश संसदीय नियंत्रण के अंतर्गत लाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था।
इस अधिनियम के तहत बंगाल के गवर्नर को बंगाल का गवर्नर-जनरल बनाया गया। वारेन हेस्टिंग्स बंगाल का पहला गवर्नर-जनरल बना।
इसके अंतर्गत कलकत्ता में एक सुप्रीम कोर्ट स्थापित करने का भी प्रावधान किया गया, जिसने 1774 ई. में कार्य करना शुरू किया।
- रेग्युलेटिंग एक्ट 1773 ई. में पारित हुआ।
- वारेन हेस्टिंग्स बंगाल का पहला गवर्नर-जनरल था।
- कलकत्ता में सुप्रीम कोर्ट की स्थापना का प्रावधान किया गया।
- कलकत्ता सुप्रीम कोर्ट ने 1774 ई. में कार्य शुरू किया।
पिट्स इंडिया एक्ट 1784
रेग्युलेटिंग एक्ट की कमियों को दूर करने और भारत में कंपनी के राजनीतिक मामलों पर ब्रिटिश सरकार का नियंत्रण मजबूत करने के लिए पिट्स इंडिया एक्ट 1784 पारित किया गया।
इस अधिनियम के अंतर्गत Board of Control स्थापित किया गया। इसके बाद कंपनी के वाणिज्यिक मामलों और राजनीतिक प्रशासन के बीच नियंत्रण की व्यवस्था अधिक स्पष्ट हुई।
1773 → Regulating Act | 1774 → Calcutta Supreme Court | 1784 → Pitt’s India Act
वारेन हेस्टिंग्स
वारेन हेस्टिंग्स 1772 ई. में बंगाल का गवर्नर बना और 1774 ई. में रेग्युलेटिंग एक्ट के तहत बंगाल का पहला गवर्नर-जनरल बना। उसके शासनकाल में कंपनी के प्रशासनिक और न्यायिक ढांचे में कई परिवर्तन किए गए।
उसने बंगाल में द्वैध शासन समाप्त किया और राजस्व प्रशासन पर कंपनी का प्रत्यक्ष नियंत्रण बढ़ाया। उसके समय प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध और द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध जैसी महत्वपूर्ण घटनाएं भी हुईं।
- 1772 ई. में बंगाल का गवर्नर बना।
- बंगाल में द्वैध शासन समाप्त किया।
- बंगाल का पहला गवर्नर-जनरल बना।
- उसके समय प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध हुआ।
- उसके समय द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध हुआ।
लॉर्ड कॉर्नवालिस और स्थायी बंदोबस्त
लॉर्ड कॉर्नवालिस 1786 ई. में भारत का गवर्नर-जनरल बना। उसके शासनकाल में प्रशासनिक, न्यायिक और राजस्व व्यवस्था में महत्वपूर्ण परिवर्तन किए गए।
कॉर्नवालिस का नाम विशेष रूप से स्थायी बंदोबस्त (Permanent Settlement) से जुड़ा है, जिसे 1793 ई. में बंगाल, बिहार और उड़ीसा के कुछ क्षेत्रों में लागू किया गया।
स्थायी बंदोबस्त
स्थायी बंदोबस्त के अंतर्गत जमींदारों को भूमि-राजस्व वसूली में महत्वपूर्ण भूमिका दी गई और सरकार को दिए जाने वाले भू-राजस्व की राशि स्थायी रूप से निश्चित कर दी गई।
कंपनी को इससे निश्चित राजस्व मिलने की आशा थी, लेकिन इस व्यवस्था का किसानों पर कई क्षेत्रों में प्रतिकूल प्रभाव पड़ा और जमींदारों की भूमिका अधिक मजबूत हुई।
- स्थायी बंदोबस्त 1793 ई. में लागू किया गया।
- इसका संबंध लॉर्ड कॉर्नवालिस से है।
- स्थायी बंदोबस्त में जमींदारों की महत्वपूर्ण भूमिका थी।
मैसूर और अंग्रेजों के बीच संघर्ष
18वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में दक्षिण भारत में मैसूर अंग्रेजों के लिए एक प्रमुख राजनीतिक और सैन्य चुनौती था। हैदर अली और उसके पुत्र टीपू सुल्तान ने मैसूर की शक्ति को मजबूत किया।
मैसूर और ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच चार प्रमुख युद्ध हुए, जिन्हें आंग्ल-मैसूर युद्ध (Anglo-Mysore Wars) कहा जाता है।
| युद्ध | अवधि | प्रमुख परिणाम / संधि |
|---|---|---|
| प्रथम आंग्ल-मैसूर युद्ध | 1767–1769 | मद्रास की संधि |
| द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध | 1780–1784 | मंगलौर की संधि |
| तृतीय आंग्ल-मैसूर युद्ध | 1790–1792 | श्रीरंगपट्टनम की संधि |
| चतुर्थ आंग्ल-मैसूर युद्ध | 1799 | टीपू सुल्तान की मृत्यु |
टीपू सुल्तान
टीपू सुल्तान मैसूर का प्रसिद्ध शासक था। उसने अंग्रेजों के विरुद्ध लगातार संघर्ष किया और अपनी सेना तथा प्रशासन को मजबूत करने के प्रयास किए।
1799 ई. के चतुर्थ आंग्ल-मैसूर युद्ध में श्रीरंगपट्टनम की रक्षा करते हुए टीपू सुल्तान मारा गया। इसके बाद दक्षिण भारत में अंग्रेजों की स्थिति और मजबूत हो गई।
1769 → मद्रास की संधि
1784 → मंगलौर की संधि
1792 → श्रीरंगपट्टनम की संधि
1799 → टीपू सुल्तान की मृत्यु
- हैदर अली और टीपू सुल्तान का संबंध मैसूर से था।
- कुल चार आंग्ल-मैसूर युद्ध हुए।
- द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध का अंत मंगलौर की संधि से हुआ।
- टीपू सुल्तान की मृत्यु 1799 ई. में चतुर्थ आंग्ल-मैसूर युद्ध के दौरान हुई।
लॉर्ड वेलेजली और सहायक संधि
लॉर्ड वेलेजली 1798 ई. में भारत का गवर्नर-जनरल बना। उसने भारत में ब्रिटिश राजनीतिक प्रभाव बढ़ाने के लिए सहायक संधि प्रणाली (Subsidiary Alliance) का व्यापक उपयोग किया।
सहायक संधि प्रणाली
इस व्यवस्था के अंतर्गत भारतीय शासकों को अपने राज्य में ब्रिटिश सेना रखने और उसके खर्च का भार उठाने जैसी शर्तें स्वीकार करनी पड़ती थीं। वे कंपनी की अनुमति के बिना अन्य शक्तियों के साथ स्वतंत्र रूप से महत्वपूर्ण राजनीतिक संबंध स्थापित नहीं कर सकते थे।
हैदराबाद का निजाम सहायक संधि स्वीकार करने वाले शुरुआती प्रमुख भारतीय शासकों में था। बाद में अवध और अन्य भारतीय राज्यों पर भी इस नीति का प्रभाव पड़ा।
- इस नीति का व्यापक विस्तार लॉर्ड वेलेजली ने किया।
- भारतीय राज्य में ब्रिटिश सैनिक तैनात किए जाते थे।
- उन सैनिकों के खर्च का भार संबंधित राज्य पर पड़ता था।
- राज्य की स्वतंत्र विदेश नीति सीमित हो जाती थी।
- इससे भारतीय राज्यों पर कंपनी का राजनीतिक नियंत्रण बढ़ा।
कॉर्नवालिस → Permanent Settlement | वेलेजली → Subsidiary Alliance
आंग्ल-मराठा युद्ध
18वीं शताब्दी के उत्तरार्ध और 19वीं शताब्दी के प्रारंभ में मराठा संघ और ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच राजनीतिक प्रभुत्व के लिए संघर्ष हुआ। इस दौरान कुल तीन आंग्ल-मराठा युद्ध हुए।
| युद्ध | अवधि |
|---|---|
| प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध | 1775–1782 |
| द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध | 1803–1805 |
| तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध | 1817–1818 |
प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध
प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध का अंत 1782 ई. की सालबाई की संधि से हुआ। इस संधि के बाद कुछ समय तक अंग्रेजों और मराठों के बीच अपेक्षाकृत शांति बनी रही।
द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध
द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध की पृष्ठभूमि में बसीन की संधि (1802) महत्वपूर्ण थी। पेशवा बाजीराव द्वितीय ने अंग्रेजों के साथ यह संधि की, जिससे मराठा संघ के अन्य प्रमुख सरदारों में असंतोष बढ़ा।
तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध
1817–1818 ई. के तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध के बाद मराठा शक्ति को निर्णायक पराजय मिली। पेशवा बाजीराव द्वितीय को पद से हटा दिया गया और पेशवा पद समाप्त हो गया।
इस विजय के बाद भारत के बड़े हिस्से में ईस्ट इंडिया कंपनी की राजनीतिक सर्वोच्चता स्थापित हो गई।
- कुल तीन आंग्ल-मराठा युद्ध हुए।
- प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध का अंत सालबाई की संधि से हुआ।
- बसीन की संधि 1802 ई. में हुई।
- तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध 1817–1818 ई. में हुआ।
- तृतीय युद्ध के बाद पेशवा पद समाप्त कर दिया गया।
ब्रिटिश भू-राजस्व व्यवस्थाएं
ब्रिटिश शासन के दौरान भारत के विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग भू-राजस्व व्यवस्थाएं लागू की गईं। प्रतियोगी परीक्षाओं में स्थायी बंदोबस्त, रैयतवाड़ी और महालवाड़ी व्यवस्था से संबंधित प्रश्न विशेष रूप से पूछे जाते हैं।
| व्यवस्था | प्रमुख संबंध | मुख्य आधार |
|---|---|---|
| स्थायी बंदोबस्त | लॉर्ड कॉर्नवालिस | जमींदार |
| रैयतवाड़ी व्यवस्था | थॉमस मुनरो से प्रमुख रूप से संबंधित | किसान / रैयत |
| महालवाड़ी व्यवस्था | होल्ट मैकेंजी से संबंधित | गांव / महाल |
Permanent → Zamindar
Ryotwari → Ryot / किसान
Mahalwari → Mahal / गांव
लॉर्ड हेस्टिंग्स
लॉर्ड हेस्टिंग्स के शासनकाल में ईस्ट इंडिया कंपनी की राजनीतिक शक्ति का व्यापक विस्तार हुआ। उसके समय आंग्ल-नेपाल युद्ध और तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध जैसी महत्वपूर्ण घटनाएं हुईं।
आंग्ल-नेपाल युद्ध के बाद 1816 ई. में सुगौली की संधि हुई। तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध के बाद मराठा संघ की राजनीतिक शक्ति को निर्णायक आघात पहुंचा और कंपनी की सर्वोच्चता अधिक मजबूत हो गई।
- सुगौली की संधि 1816 ई. में हुई।
- इस संधि का संबंध आंग्ल-नेपाल युद्ध से है।
- तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध लॉर्ड हेस्टिंग्स के समय हुआ।
- 1818 ई. के बाद कंपनी की राजनीतिक सर्वोच्चता और मजबूत हुई।
1765 → द्वैध शासन | 1773 → Regulating Act | 1784 → Pitt’s India Act | 1793 → Permanent Settlement | 1799 → टीपू सुल्तान की मृत्यु | 1802 → बसीन की संधि | 1816 → सुगौली की संधि | 1818 → मराठा शक्ति की निर्णायक पराजय
लॉर्ड विलियम बेंटिंक
लॉर्ड विलियम बेंटिंक 1828 ई. में गवर्नर-जनरल बना। उसके शासनकाल में कई महत्वपूर्ण सामाजिक, प्रशासनिक और शैक्षिक सुधार किए गए। 1833 के चार्टर एक्ट के बाद वह भारत का पहला गवर्नर-जनरल बना।
सती प्रथा का उन्मूलन
बेंटिंक के शासनकाल की सबसे महत्वपूर्ण सामाजिक उपलब्धियों में सती प्रथा का उन्मूलन था। समाज सुधारक राजा राममोहन राय ने सती प्रथा के विरुद्ध महत्वपूर्ण अभियान चलाया।
दिसंबर 1829 में बंगाल प्रेसीडेंसी में एक विनियमन के माध्यम से सती प्रथा को अवैध घोषित किया गया। बाद में इस प्रतिबंध का विस्तार अन्य क्षेत्रों में भी हुआ।
ठगी प्रथा का दमन
बेंटिंक के समय ठगी से संबंधित गिरोहों के विरुद्ध व्यापक अभियान चलाया गया। इस अभियान में विलियम हेनरी स्लीमन की महत्वपूर्ण भूमिका थी।
- सती प्रथा को 1829 ई. में अवैध घोषित किया गया।
- इस समय गवर्नर-जनरल लॉर्ड विलियम बेंटिंक था।
- राजा राममोहन राय ने सती प्रथा के विरुद्ध अभियान चलाया।
- ठगी के दमन में विलियम हेनरी स्लीमन की महत्वपूर्ण भूमिका थी।
अंग्रेजी शिक्षा का विकास
ब्रिटिश शासन के दौरान भारत में आधुनिक शिक्षा की नीति में महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए। 1835 ई. में थॉमस बैबिंगटन मैकॉले ने अपना प्रसिद्ध शिक्षा संबंधी मिनट प्रस्तुत किया, जिसमें अंग्रेजी भाषा के माध्यम से पश्चिमी शिक्षा को बढ़ावा देने का समर्थन किया गया।
इसके बाद अंग्रेजी शिक्षा को सरकारी संरक्षण मिला। आगे चलकर 1854 ई. का वुड्स डिस्पैच (Wood’s Despatch) भारत में आधुनिक शिक्षा के विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण दस्तावेज बना।
वुड्स डिस्पैच 1854
वुड्स डिस्पैच में शिक्षा विभाग स्थापित करने, शिक्षक प्रशिक्षण, प्राथमिक से उच्च शिक्षा तक संस्थानों के विकास तथा विश्वविद्यालयों की स्थापना जैसी सिफारिशें की गईं।
1857 ई. में कलकत्ता, बंबई और मद्रास में विश्वविद्यालय स्थापित किए गए।
| घटना | वर्ष |
|---|---|
| मैकॉले का शिक्षा संबंधी मिनट | 1835 ई. |
| वुड्स डिस्पैच | 1854 ई. |
| कलकत्ता, बंबई और मद्रास विश्वविद्यालय | 1857 ई. |
1835 → मैकॉले मिनट | 1854 → वुड्स डिस्पैच | 1857 → कलकत्ता, बंबई और मद्रास विश्वविद्यालय
लॉर्ड डलहौजी
लॉर्ड डलहौजी 1848 से 1856 ई. तक भारत का गवर्नर-जनरल रहा। उसके शासनकाल में ब्रिटिश साम्राज्य का तेजी से विस्तार हुआ। साथ ही रेलवे, टेलीग्राफ और डाक व्यवस्था जैसे आधुनिक संचार साधनों का भी विकास हुआ।
डलहौजी की सबसे चर्चित राजनीतिक नीतियों में व्यपगत सिद्धांत (Doctrine of Lapse) था, जिसके माध्यम से कई भारतीय रियासतों को ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया गया।
व्यपगत सिद्धांत – Doctrine of Lapse
इस नीति के अनुसार यदि कंपनी के अधीन किसी रियासत के शासक का प्राकृतिक पुरुष उत्तराधिकारी नहीं होता, तो कंपनी दत्तक उत्तराधिकारी को शासक के रूप में मान्यता देने से इनकार कर उस राज्य को अपने नियंत्रण में ले सकती थी।
इस नीति के तहत सतारा, झांसी और नागपुर सहित कई रियासतों को ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया गया।
- सतारा – 1848 ई.
- जैतपुर – 1849 ई.
- संबलपुर – 1849 ई.
- झांसी – 1853 ई.
- नागपुर – 1854 ई.
अवध को Doctrine of Lapse के तहत नहीं मिलाया गया था। ब्रिटिश सरकार ने 1856 ई. में कुशासन का आरोप लगाकर अवध का विलय किया था।
रेलवे की शुरुआत
भारत में पहली यात्री रेलगाड़ी 16 अप्रैल 1853 को बंबई से ठाणे के बीच चली। यह आधुनिक भारतीय परिवहन इतिहास की महत्वपूर्ण घटना थी।
टेलीग्राफ और डाक व्यवस्था
डलहौजी के शासनकाल में टेलीग्राफ नेटवर्क का विस्तार किया गया। 1854 ई. में डाक व्यवस्था में महत्वपूर्ण सुधार किए गए और एक समान डाक प्रणाली को विकसित किया गया।
- व्यपगत सिद्धांत का संबंध लॉर्ड डलहौजी से है।
- झांसी को 1853 ई. में इस नीति के तहत मिलाया गया।
- भारत की पहली यात्री रेल 1853 ई. में बंबई से ठाणे चली।
- अवध का विलय 1856 ई. में हुआ।
- अवध का विलय Doctrine of Lapse के आधार पर नहीं हुआ था।
सामाजिक एवं धार्मिक सुधार आंदोलन
19वीं शताब्दी में भारतीय समाज में कई महत्वपूर्ण सामाजिक और धार्मिक सुधार आंदोलन शुरू हुए। इन आंदोलनों ने शिक्षा, सामाजिक कुरीतियों, महिलाओं की स्थिति, धार्मिक सुधार और सामाजिक जागरूकता जैसे विषयों पर ध्यान दिया।
राजा राममोहन राय, ईश्वरचंद्र विद्यासागर, स्वामी दयानंद सरस्वती, स्वामी विवेकानंद, सर सैयद अहमद खां और अन्य समाज सुधारकों ने आधुनिक भारत के सामाजिक एवं बौद्धिक विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
राजा राममोहन राय और ब्रह्म समाज
राजा राममोहन राय 19वीं शताब्दी के प्रमुख भारतीय समाज सुधारकों में से एक थे। उन्होंने सती प्रथा, सामाजिक रूढ़ियों और कई कुरीतियों का विरोध किया तथा आधुनिक शिक्षा और सामाजिक सुधार का समर्थन किया।
उन्होंने 1828 ई. में ब्रह्म सभा की स्थापना की, जो आगे चलकर ब्रह्म समाज के रूप में प्रसिद्ध हुई।
राजा राममोहन राय के प्रमुख योगदान
- सती प्रथा के विरुद्ध अभियान।
- महिलाओं की स्थिति में सुधार का समर्थन।
- आधुनिक शिक्षा का समर्थन।
- प्रेस की स्वतंत्रता का समर्थन।
- धार्मिक और सामाजिक सुधार पर जोर।
- ब्रह्म सभा की स्थापना 1828 ई. में हुई।
- इसके संस्थापक राजा राममोहन राय थे।
- राजा राममोहन राय ने सती प्रथा का विरोध किया।
ईश्वरचंद्र विद्यासागर और विधवा पुनर्विवाह
ईश्वरचंद्र विद्यासागर बंगाल के प्रमुख शिक्षाविद और समाज सुधारक थे। उन्होंने महिलाओं की शिक्षा और हिंदू विधवाओं के पुनर्विवाह के समर्थन में महत्वपूर्ण अभियान चलाया।
उनके प्रयासों ने हिंदू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम, 1856 के लिए सामाजिक समर्थन तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
सती प्रथा उन्मूलन → 1829 | विधवा पुनर्विवाह अधिनियम → 1856
स्वामी दयानंद सरस्वती और आर्य समाज
स्वामी दयानंद सरस्वती 19वीं शताब्दी के महत्वपूर्ण धार्मिक और सामाजिक सुधारकों में से एक थे। उन्होंने 1875 ई. में आर्य समाज की स्थापना बंबई में की।
स्वामी दयानंद ने वेदों की ओर लौटने पर जोर दिया और सामाजिक कुरीतियों का विरोध किया। उनकी प्रसिद्ध पुस्तक सत्यार्थ प्रकाश है।
स्वामी विवेकानंद और रामकृष्ण मिशन
स्वामी विवेकानंद रामकृष्ण परमहंस के प्रमुख शिष्यों में से एक थे। उन्होंने भारतीय दर्शन और वेदांत के विचारों को भारत के साथ-साथ विश्व स्तर पर लोकप्रिय बनाया।
1893 ई. में उन्होंने अमेरिका के शिकागो में आयोजित विश्व धर्म संसद में प्रसिद्ध भाषण दिया। 1897 ई. में उन्होंने रामकृष्ण मिशन की स्थापना की।
- स्वामी विवेकानंद के गुरु रामकृष्ण परमहंस थे।
- शिकागो विश्व धर्म संसद में उनका प्रसिद्ध भाषण 1893 ई. में हुआ।
- रामकृष्ण मिशन की स्थापना 1897 ई. में हुई।
प्रार्थना समाज
प्रार्थना समाज की स्थापना 1867 ई. में बंबई में आत्माराम पांडुरंग ने की। इस संगठन ने सामाजिक सुधार, महिला शिक्षा, विधवा पुनर्विवाह और जातिगत भेदभाव को कम करने जैसे विषयों पर जोर दिया।
महादेव गोविंद रानाडे प्रार्थना समाज से जुड़े प्रमुख समाज सुधारकों में से एक थे।
ज्योतिबा फुले और सत्यशोधक समाज
ज्योतिराव गोविंदराव फुले महाराष्ट्र के प्रमुख समाज सुधारक थे। उन्होंने जातिगत असमानता और सामाजिक भेदभाव का विरोध किया तथा महिलाओं और वंचित वर्गों की शिक्षा पर विशेष जोर दिया।
1873 ई. में उन्होंने सत्यशोधक समाज की स्थापना की। उनकी पत्नी सावित्रीबाई फुले भारत में महिला शिक्षा की अग्रणी शिक्षिकाओं और समाज सुधारकों में गिनी जाती हैं।
- सत्यशोधक समाज की स्थापना 1873 ई. में हुई।
- इसके संस्थापक ज्योतिबा फुले थे।
- सावित्रीबाई फुले महिला शिक्षा की अग्रणी समाज सुधारक थीं।
सर सैयद अहमद खां और अलीगढ़ आंदोलन
सर सैयद अहमद खां ने भारतीय मुसलमानों के बीच आधुनिक शिक्षा के प्रसार पर विशेष जोर दिया। उनके प्रयासों से जुड़ा सुधार अभियान अलीगढ़ आंदोलन के नाम से जाना जाता है।
उन्होंने 1875 ई. में अलीगढ़ में मोहम्मडन एंग्लो-ओरिएंटल कॉलेज की स्थापना की। आगे चलकर यही संस्थान अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के विकास का आधार बना।
सुधार आंदोलन – Quick Revision
| आंदोलन / संस्था | संस्थापक / प्रमुख व्यक्ति | वर्ष |
|---|---|---|
| ब्रह्म सभा / ब्रह्म समाज | राजा राममोहन राय | 1828 |
| प्रार्थना समाज | आत्माराम पांडुरंग | 1867 |
| सत्यशोधक समाज | ज्योतिबा फुले | 1873 |
| आर्य समाज | स्वामी दयानंद सरस्वती | 1875 |
| मोहम्मडन एंग्लो-ओरिएंटल कॉलेज | सर सैयद अहमद खां | 1875 |
| रामकृष्ण मिशन | स्वामी विवेकानंद | 1897 |
1828 → ब्रह्म सभा | 1829 → सती प्रथा उन्मूलन | 1835 → मैकॉले मिनट | 1853 → पहली रेल | 1854 → वुड्स डिस्पैच | 1856 → विधवा पुनर्विवाह अधिनियम | 1873 → सत्यशोधक समाज | 1875 → आर्य समाज | 1893 → शिकागो भाषण | 1897 → रामकृष्ण मिशन
1857 की क्रांति
1857 की क्रांति आधुनिक भारतीय इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक थी। यह ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन के विरुद्ध एक व्यापक सशस्त्र विद्रोह था, जिसमें सैनिकों के साथ अनेक भारतीय शासकों, जमींदारों और आम लोगों ने भी भाग लिया।
विद्रोह की शुरुआत सैनिक असंतोष से हुई, लेकिन इसके पीछे राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक और सैन्य कारणों का सम्मिलित प्रभाव था। इसका प्रमुख केंद्र उत्तर और मध्य भारत रहा।
1857 की क्रांति के प्रमुख कारण
| कारण | मुख्य तथ्य |
|---|---|
| राजनीतिक | व्यपगत सिद्धांत, अवध का विलय और भारतीय शासकों की सत्ता में हस्तक्षेप |
| आर्थिक | कठोर भू-राजस्व नीतियां और पारंपरिक उद्योगों पर प्रतिकूल प्रभाव |
| सामाजिक-धार्मिक | धार्मिक एवं सामाजिक मामलों में हस्तक्षेप की आशंका |
| सैन्य | भारतीय सैनिकों के साथ भेदभाव और सेवा संबंधी असंतोष |
| तात्कालिक | एनफील्ड राइफल के कारतूसों से जुड़ा विवाद |
एनफील्ड राइफल और कारतूस विवाद
1857 के विद्रोह का तात्कालिक कारण नई एनफील्ड राइफल के कारतूसों से जुड़ा विवाद माना जाता है। सैनिकों में यह धारणा फैल गई कि इन कारतूसों पर गाय और सूअर की चर्बी लगी है और उन्हें इस्तेमाल करने से पहले दांतों से काटना पड़ता है।
इससे हिंदू और मुस्लिम दोनों सैनिकों की धार्मिक भावनाएं प्रभावित हुईं और पहले से मौजूद असंतोष तेजी से बढ़ गया।
- 1857 के विद्रोह का तात्कालिक कारण एनफील्ड राइफल के कारतूसों का विवाद माना जाता है।
- विद्रोह के पीछे राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक-धार्मिक और सैन्य कारण भी थे।
- अवध का विलय 1856 ई. में किया गया था।
मंगल पांडे और बैरकपुर की घटना
मंगल पांडे बंगाल सेना के एक भारतीय सैनिक थे। 29 मार्च 1857 को बैरकपुर में उन्होंने ब्रिटिश अधिकारियों के विरुद्ध कार्रवाई की। इस घटना को 1857 के विद्रोह की महत्वपूर्ण प्रारंभिक घटनाओं में गिना जाता है।
मंगल पांडे को गिरफ्तार किया गया और 8 अप्रैल 1857 को फांसी दे दी गई।
मेरठ से विद्रोह की शुरुआत
1857 का व्यापक सैनिक विद्रोह 10 मई 1857 को मेरठ में शुरू हुआ। विद्रोही सैनिक मेरठ से दिल्ली पहुंचे और मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर को विद्रोह का प्रतीकात्मक नेता घोषित किया।
दिल्ली पर विद्रोहियों का नियंत्रण स्थापित होने के बाद आंदोलन तेजी से उत्तर और मध्य भारत के विभिन्न क्षेत्रों में फैल गया।
29 मार्च 1857 → बैरकपुर में मंगल पांडे
10 मई 1857 → मेरठ में व्यापक विद्रोह
दिल्ली → बहादुर शाह जफर
1857 की क्रांति के प्रमुख केंद्र और नेता
1857 का विद्रोह विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग नेताओं के नेतृत्व में लड़ा गया। प्रतियोगी परीक्षाओं में नेता और संबंधित केंद्र से प्रश्न अक्सर पूछे जाते हैं।
| केंद्र | प्रमुख नेता |
|---|---|
| दिल्ली | बहादुर शाह जफर |
| कानपुर | नाना साहेब |
| झांसी | रानी लक्ष्मीबाई |
| लखनऊ | बेगम हजरत महल |
| बिहार / जगदीशपुर | कुंवर सिंह |
| बरेली | खान बहादुर खान |
| फैजाबाद | मौलवी अहमदुल्लाह शाह |
बहादुर शाह जफर
बहादुर शाह जफर अंतिम मुगल सम्राट थे। विद्रोहियों ने दिल्ली पहुंचकर उन्हें 1857 के विद्रोह का प्रतीकात्मक नेतृत्व प्रदान किया। विद्रोह की विफलता के बाद अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार किया और रंगून निर्वासित कर दिया।
नाना साहेब
नाना साहेब ने कानपुर में विद्रोह का नेतृत्व किया। वे अंतिम पेशवा बाजीराव द्वितीय के दत्तक पुत्र थे। तात्या टोपे उनके प्रमुख सहयोगियों में से थे।
रानी लक्ष्मीबाई
रानी लक्ष्मीबाई ने झांसी में अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष किया। झांसी को डलहौजी की व्यपगत नीति के तहत ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया गया था।
झांसी के बाद रानी लक्ष्मीबाई ने कालपी और ग्वालियर क्षेत्र में भी संघर्ष किया। 1858 ई. में ग्वालियर के निकट लड़ते हुए उनकी मृत्यु हुई।
तात्या टोपे
तात्या टोपे 1857 के विद्रोह के प्रमुख सैन्य नेताओं में से एक थे। उन्होंने कानपुर, कालपी और मध्य भारत के विभिन्न क्षेत्रों में अंग्रेजों के विरुद्ध सैन्य अभियान चलाए।
कुंवर सिंह
बिहार में विद्रोह का प्रमुख नेतृत्व कुंवर सिंह ने किया। उनका प्रमुख केंद्र जगदीशपुर था। अधिक आयु के बावजूद उन्होंने अंग्रेजों के विरुद्ध सक्रिय सैन्य संघर्ष किया।
- दिल्ली → बहादुर शाह जफर
- कानपुर → नाना साहेब
- झांसी → रानी लक्ष्मीबाई
- लखनऊ → बेगम हजरत महल
- बिहार → कुंवर सिंह
- बरेली → खान बहादुर खान
1857 के विद्रोह का स्वरूप
1857 के विद्रोह के स्वरूप को लेकर इतिहासकारों में अलग-अलग मत रहे हैं। ब्रिटिश लेखकों के एक वर्ग ने इसे मुख्यतः सैनिक विद्रोह (Sepoy Mutiny) के रूप में प्रस्तुत किया, जबकि कई भारतीय राष्ट्रवादी इतिहासकारों ने इसे व्यापक राष्ट्रीय प्रतिरोध के रूप में देखा।
वी. डी. सावरकर ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक The Indian War of Independence, 1857 में इसे भारत के स्वतंत्रता संग्राम के रूप में प्रस्तुत किया।
आधुनिक ऐतिहासिक अध्ययन सामान्यतः इस बात पर जोर देते हैं कि विद्रोह का स्वरूप सभी क्षेत्रों में समान नहीं था। इसमें सैनिक विद्रोह के साथ-साथ कई क्षेत्रों में नागरिक, जमींदार, शासक और अन्य सामाजिक समूह भी शामिल हुए।
1857 की क्रांति की असफलता के कारण
1857 का विद्रोह अंग्रेजी शासन को समाप्त नहीं कर सका। इसके पीछे सैन्य, संगठनात्मक और भौगोलिक सहित कई महत्वपूर्ण कारण थे।
- विद्रोह पूरे भारत में समान रूप से नहीं फैला।
- एकीकृत केंद्रीय नेतृत्व का अभाव था।
- विद्रोहियों के पास आधुनिक हथियार और पर्याप्त संसाधन नहीं थे।
- विभिन्न विद्रोही नेताओं के उद्देश्य पूरी तरह समान नहीं थे।
- कई भारतीय शासकों और रियासतों ने विद्रोह में भाग नहीं लिया।
- अंग्रेजों के पास बेहतर संचार और परिवहन व्यवस्था थी।
- पंजाब और अन्य क्षेत्रों से अंग्रेजों को सैनिक सहायता मिली।
1857 की क्रांति के परिणाम
यद्यपि 1857 का विद्रोह असफल रहा, लेकिन इसके बाद भारत की प्रशासनिक व्यवस्था में बड़े परिवर्तन किए गए। सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तन था ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन का अंत।
भारत शासन अधिनियम 1858
Government of India Act 1858 के माध्यम से भारत का शासन ईस्ट इंडिया कंपनी से लेकर सीधे ब्रिटिश क्राउन के अधीन कर दिया गया।
ब्रिटिश सरकार में भारत सचिव (Secretary of State for India) का पद बनाया गया। भारत में गवर्नर-जनरल अब ब्रिटिश क्राउन के प्रतिनिधि के रूप में वायसराय की भूमिका भी निभाने लगा।
लॉर्ड कैनिंग भारत का पहला वायसराय बना।
महारानी विक्टोरिया की घोषणा
1 नवंबर 1858 को महारानी विक्टोरिया की घोषणा जारी की गई। इसमें भारतीय रियासतों के साथ संधियों का सम्मान करने और धार्मिक मामलों में अनावश्यक हस्तक्षेप न करने जैसी नीतियों की घोषणा की गई।
मंगल पांडे → बैरकपुर | 10 मई → मेरठ | दिल्ली → बहादुर शाह जफर | कानपुर → नाना साहेब | झांसी → रानी लक्ष्मीबाई | लखनऊ → बेगम हजरत महल | बिहार → कुंवर सिंह | 1858 → कंपनी शासन समाप्त
प्रारंभिक राजनीतिक संगठनों का विकास
19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में भारत में राजनीतिक जागरूकता बढ़ने लगी। शिक्षित भारतीयों ने विभिन्न राजनीतिक संगठनों की स्थापना की, जिन्होंने आगे चलकर राष्ट्रीय आंदोलन के विकास के लिए आधार तैयार किया।
| संस्था | वर्ष | प्रमुख व्यक्ति |
|---|---|---|
| ईस्ट इंडिया एसोसिएशन | 1866 | दादाभाई नौरोजी |
| पूना सार्वजनिक सभा | 1870 | महादेव गोविंद रानाडे सहित अन्य नेता |
| इंडियन एसोसिएशन | 1876 | सुरेंद्रनाथ बनर्जी और आनंद मोहन बोस |
| मद्रास महाजन सभा | 1884 | जी. सुब्रमण्यम अय्यर, एम. वीरराघवाचार्य आदि |
| बॉम्बे प्रेसीडेंसी एसोसिएशन | 1885 | फिरोजशाह मेहता, के. टी. तेलंग, बदरुद्दीन तैयबजी |
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना
आधुनिक भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के इतिहास में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (Indian National Congress) की स्थापना एक महत्वपूर्ण घटना थी। कांग्रेस की स्थापना 1885 ई. में हुई।
इसके गठन में सेवानिवृत्त ब्रिटिश अधिकारी ए. ओ. ह्यूम ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कांग्रेस का पहला अधिवेशन दिसंबर 1885 में बंबई में आयोजित हुआ।
इस अधिवेशन की अध्यक्षता व्योमेश चंद्र बनर्जी (W. C. Bonnerjee) ने की और इसमें 72 प्रतिनिधियों ने भाग लिया।
- भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना 1885 ई. में हुई।
- इसके गठन में ए. ओ. ह्यूम ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- पहला अधिवेशन बंबई में हुआ।
- पहले अधिवेशन के अध्यक्ष W. C. Bonnerjee थे।
- पहले अधिवेशन में 72 प्रतिनिधियों ने भाग लिया।
कांग्रेस का उदारवादी चरण
कांग्रेस के प्रारंभिक नेताओं को सामान्यतः उदारवादी (Moderates) कहा जाता है। लगभग 1885 से 1905 के बीच कांग्रेस की राजनीति पर इनका प्रमुख प्रभाव रहा।
उदारवादी नेता संवैधानिक और शांतिपूर्ण तरीकों से सुधारों की मांग करते थे। वे प्रार्थना-पत्र, प्रस्ताव, सार्वजनिक भाषण और राजनीतिक प्रतिनिधित्व जैसे माध्यमों का उपयोग करते थे।
प्रमुख उदारवादी नेता
- दादाभाई नौरोजी
- गोपाल कृष्ण गोखले
- फिरोजशाह मेहता
- सुरेंद्रनाथ बनर्जी
- एम. जी. रानाडे
दादाभाई नौरोजी और धन-निष्कासन सिद्धांत
दादाभाई नौरोजी ने ब्रिटिश शासन के दौरान भारत से धन के बाहर जाने की प्रक्रिया का आर्थिक विश्लेषण किया, जिसे धन-निष्कासन सिद्धांत (Drain Theory) के नाम से जाना जाता है।
उनकी प्रसिद्ध पुस्तक Poverty and Un-British Rule in India भारतीय राष्ट्रवादी आर्थिक चिंतन की महत्वपूर्ण रचनाओं में गिनी जाती है।
- Drain Theory का संबंध दादाभाई नौरोजी से है।
- गोपाल कृष्ण गोखले प्रमुख उदारवादी नेता थे।
- उदारवादी मुख्यतः संवैधानिक और शांतिपूर्ण तरीकों पर जोर देते थे।
गरम दल का उदय
20वीं शताब्दी के प्रारंभ में कांग्रेस के भीतर ऐसे नेताओं का प्रभाव बढ़ा जो उदारवादियों की अपेक्षा अधिक सक्रिय और जन-आधारित राजनीतिक संघर्ष के पक्षधर थे। इन्हें सामान्यतः गरम दल (Extremists) कहा जाता है।
गरम दल के तीन प्रमुख नेताओं बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय और बिपिन चंद्र पाल को सामूहिक रूप से लाल-बाल-पाल कहा जाता है।
बाल गंगाधर तिलक
बाल गंगाधर तिलक ने राष्ट्रीय आंदोलन में जनभागीदारी बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने सार्वजनिक गणपति उत्सव और शिवाजी उत्सव जैसे आयोजनों का उपयोग लोगों में राजनीतिक जागरूकता बढ़ाने के लिए किया।
तिलक के समाचार पत्र केसरी और मराठा भी राष्ट्रवादी विचारों के प्रसार में महत्वपूर्ण थे।
बंगाल विभाजन और स्वदेशी आंदोलन
लॉर्ड कर्जन के शासनकाल में 1905 ई. में बंगाल का विभाजन किया गया। विभाजन 16 अक्टूबर 1905 से प्रभावी हुआ। भारतीय राष्ट्रवादियों ने इसे राजनीतिक रूप से विभाजनकारी नीति के रूप में देखा और इसका व्यापक विरोध किया।
बंगाल विभाजन के विरोध से स्वदेशी और बहिष्कार आंदोलन को बल मिला। विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार और भारतीय वस्तुओं के उपयोग को प्रोत्साहित किया गया।
स्वदेशी आंदोलन
स्वदेशी आंदोलन केवल विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार तक सीमित नहीं था। इसने राष्ट्रीय शिक्षा, स्वदेशी उद्योग और जनभागीदारी को भी प्रोत्साहित किया।
व्यापक विरोध के बाद 1911 ई. में बंगाल विभाजन रद्द कर दिया गया।
1905 → बंगाल विभाजन
लॉर्ड कर्जन → बंगाल विभाजन
स्वदेशी + बहिष्कार → विभाजन का विरोध
1911 → बंगाल विभाजन रद्द
सूरत विभाजन 1907
कांग्रेस के उदारवादी और गरम दल के नेताओं के बीच राजनीतिक रणनीति और आंदोलन के तरीकों को लेकर मतभेद बढ़ते गए। इन मतभेदों का परिणाम 1907 ई. के सूरत अधिवेशन में कांग्रेस के विभाजन के रूप में सामने आया।
सूरत विभाजन के बाद कुछ वर्षों तक कांग्रेस के दोनों समूह अलग-अलग रहे। बाद में 1916 के लखनऊ अधिवेशन में दोनों धाराओं का पुनर्मिलन हुआ।
1885 → कांग्रेस की स्थापना | W. C. Bonnerjee → प्रथम अध्यक्ष | दादाभाई नौरोजी → Drain Theory | लाल-बाल-पाल → गरम दल | 1905 → बंगाल विभाजन | 1907 → सूरत विभाजन | 1911 → बंगाल विभाजन रद्द
मुस्लिम लीग की स्थापना
अखिल भारतीय मुस्लिम लीग (All-India Muslim League) की स्थापना 30 दिसंबर 1906 को ढाका में हुई। इसकी स्थापना में नवाब सलीमुल्लाह खां, आगा खां तथा अन्य मुस्लिम नेताओं की महत्वपूर्ण भूमिका थी।
प्रारंभिक दौर में मुस्लिम लीग का उद्देश्य ब्रिटिश सरकार के प्रति निष्ठा बनाए रखते हुए भारतीय मुसलमानों के राजनीतिक हितों की रक्षा करना था। आगे चलकर यह भारतीय राजनीति की एक महत्वपूर्ण राजनीतिक संस्था बन गई।
मार्ले-मिंटो सुधार 1909
Indian Councils Act 1909 को सामान्यतः मार्ले-मिंटो सुधार (Morley-Minto Reforms) कहा जाता है। उस समय जॉन मार्ले भारत सचिव और लॉर्ड मिंटो भारत के वायसराय थे।
इस अधिनियम की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन (Separate Electorate) की व्यवस्था थी। इसके अंतर्गत मुस्लिम मतदाता मुस्लिम प्रतिनिधियों के निर्वाचन में अलग निर्वाचन व्यवस्था के तहत भाग लेते थे।
- मार्ले-मिंटो सुधार 1909 ई. में लागू हुए।
- इन्हें Indian Councils Act 1909 भी कहा जाता है।
- इन सुधारों में मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन की व्यवस्था की गई।
- उस समय भारत के वायसराय लॉर्ड मिंटो द्वितीय थे।
भारत की राजधानी कलकत्ता से दिल्ली
1911 ई. के दिल्ली दरबार में ब्रिटिश भारत की राजधानी को कलकत्ता से दिल्ली स्थानांतरित करने की घोषणा की गई। इसी समय 1905 के बंगाल विभाजन को भी रद्द करने की घोषणा हुई।
1905 → बंगाल विभाजन
1911 → बंगाल विभाजन रद्द
1911 → राजधानी कलकत्ता से दिल्ली स्थानांतरित करने की घोषणा
होमरूल आंदोलन
प्रथम विश्व युद्ध के दौरान भारत में स्वशासन की मांग को मजबूत करने के उद्देश्य से होमरूल आंदोलन (Home Rule Movement) शुरू हुआ। इसके प्रमुख नेताओं में बाल गंगाधर तिलक और एनी बेसेंट शामिल थे।
1916 ई. में तिलक और एनी बेसेंट ने अलग-अलग Home Rule Leagues के माध्यम से स्वशासन की मांग को जनता तक पहुंचाया।
लखनऊ अधिवेशन और लखनऊ समझौता 1916
1916 का लखनऊ अधिवेशन भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के इतिहास में महत्वपूर्ण था। इस अधिवेशन में कांग्रेस के उदारवादी और गरम दल के बीच पुनर्मिलन हुआ।
इसी समय कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच लखनऊ समझौता (Lucknow Pact) हुआ। दोनों संगठनों ने संवैधानिक सुधारों से संबंधित कुछ संयुक्त मांगों पर सहमति व्यक्त की।
- लखनऊ समझौता 1916 ई. में हुआ।
- यह समझौता कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच हुआ।
- 1916 में कांग्रेस के उदारवादी और गरम दल का पुनर्मिलन हुआ।
गांधी युग की शुरुआत
महात्मा गांधी दक्षिण अफ्रीका में सत्याग्रह के प्रयोगों के बाद 9 जनवरी 1915 को भारत लौटे। उनके भारत आगमन के साथ राष्ट्रीय आंदोलन में धीरे-धीरे एक नए जन-आधारित राजनीतिक चरण का विकास हुआ।
गांधीजी ने सत्याग्रह और अहिंसा को राजनीतिक संघर्ष के प्रमुख साधनों के रूप में अपनाया। भारत में उनके शुरुआती आंदोलनों में चंपारण सत्याग्रह, अहमदाबाद मिल हड़ताल और खेड़ा सत्याग्रह विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं।
1917 → चंपारण
1918 → अहमदाबाद मिल हड़ताल
1918 → खेड़ा सत्याग्रह
चंपारण सत्याग्रह 1917
चंपारण सत्याग्रह भारत में गांधीजी के शुरुआती और सबसे महत्वपूर्ण सत्याग्रह आंदोलनों में से एक था। यह 1917 ई. में बिहार के चंपारण जिले में हुआ।
चंपारण के किसानों को नील की खेती से जुड़ी तीनकठिया व्यवस्था और अन्य समस्याओं का सामना करना पड़ रहा था। राजकुमार शुक्ल ने गांधीजी का ध्यान चंपारण के किसानों की समस्याओं की ओर आकर्षित किया।
गांधीजी ने किसानों की शिकायतों की जांच की और उनके पक्ष में शांतिपूर्ण संघर्ष किया। चंपारण आंदोलन ने भारत में गांधीजी के नेतृत्व को व्यापक पहचान दिलाई।
- चंपारण सत्याग्रह 1917 ई. में हुआ।
- इसका संबंध नील की खेती से था।
- राजकुमार शुक्ल गांधीजी को चंपारण ले जाने में महत्वपूर्ण थे।
- यह भारत में गांधीजी के शुरुआती महत्वपूर्ण सत्याग्रहों में से एक था।
अहमदाबाद मिल हड़ताल 1918
अहमदाबाद मिल हड़ताल 1918 ई. में गुजरात के अहमदाबाद में कपड़ा मिल मजदूरों और मिल मालिकों के बीच मजदूरी से संबंधित विवाद के कारण हुई।
गांधीजी ने मजदूरों की मांगों का समर्थन किया और इस संघर्ष में सत्याग्रह के सिद्धांतों का प्रयोग किया। गांधीजी ने इस दौरान उपवास भी किया।
खेड़ा सत्याग्रह 1918
खेड़ा सत्याग्रह 1918 ई. में गुजरात के खेड़ा जिले में किसानों से संबंधित आंदोलन था। फसल खराब होने के बावजूद सरकार द्वारा भू-राजस्व वसूली पर जोर दिए जाने से किसानों में असंतोष था।
गांधीजी और उनके सहयोगियों ने किसानों के पक्ष में राजस्व में राहत की मांग की। वल्लभभाई पटेल ने भी इस आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
| आंदोलन | वर्ष | संबंधित वर्ग / मुद्दा |
|---|---|---|
| चंपारण सत्याग्रह | 1917 | नील किसान |
| अहमदाबाद मिल हड़ताल | 1918 | मिल मजदूर / मजदूरी |
| खेड़ा सत्याग्रह | 1918 | किसान / भू-राजस्व |
चंपारण → किसान → नील | अहमदाबाद → मजदूर → मजदूरी | खेड़ा → किसान → भू-राजस्व
रॉलेट एक्ट 1919
प्रथम विश्व युद्ध के बाद ब्रिटिश सरकार ने रॉलेट एक्ट (Rowlatt Act) 1919 में पारित किया। इस कानून ने सरकार को राजनीतिक गतिविधियों पर कठोर नियंत्रण और कुछ परिस्थितियों में बिना सामान्य न्यायिक प्रक्रिया के गिरफ्तारी तथा नजरबंदी की व्यापक शक्तियां दीं।
भारतीय नेताओं ने इस कानून का तीव्र विरोध किया। गांधीजी ने इसके विरोध में देशव्यापी रॉलेट सत्याग्रह का आह्वान किया।
- रॉलेट एक्ट 1919 ई. में पारित हुआ।
- भारतीय नेताओं ने इसे नागरिक स्वतंत्रताओं पर गंभीर प्रतिबंध के रूप में देखा।
- गांधीजी ने इसके विरोध में रॉलेट सत्याग्रह शुरू किया।
जलियांवाला बाग हत्याकांड
13 अप्रैल 1919 को पंजाब के अमृतसर स्थित जलियांवाला बाग में एक बड़ी सभा एकत्र हुई थी। उस दिन बैसाखी का त्योहार भी था।
ब्रिगेडियर जनरल रेजिनाल्ड डायर सैनिकों के साथ वहां पहुंचा और बिना भीड़ को सुरक्षित रूप से निकलने का पर्याप्त अवसर दिए गोली चलाने का आदेश दिया। इस गोलीबारी में बड़ी संख्या में लोग मारे गए और घायल हुए।
इस घटना ने पूरे भारत में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध गहरा आक्रोश उत्पन्न किया। घटना की जांच के लिए बाद में हंटर समिति नियुक्त की गई।
रवीन्द्रनाथ टैगोर की प्रतिक्रिया
जलियांवाला बाग हत्याकांड के विरोध में रवीन्द्रनाथ टैगोर ने ब्रिटिश सरकार द्वारा दी गई अपनी नाइटहुड की उपाधि त्याग दी।
- जलियांवाला बाग हत्याकांड 13 अप्रैल 1919 को हुआ।
- यह घटना अमृतसर में हुई।
- गोली चलाने का आदेश जनरल डायर ने दिया।
- जांच के लिए हंटर समिति बनाई गई।
- रवीन्द्रनाथ टैगोर ने अपनी नाइटहुड त्याग दी।
भारत शासन अधिनियम 1919
Government of India Act 1919 को मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार भी कहा जाता है। इसके माध्यम से प्रांतीय प्रशासन में द्वैध शासन (Dyarchy) की व्यवस्था लागू की गई।
प्रांतीय विषयों को आरक्षित और हस्तांतरित विषयों में बांटा गया। इससे प्रांतीय शासन में भारतीय मंत्रियों की सीमित भागीदारी बढ़ी, हालांकि महत्वपूर्ण शक्तियां ब्रिटिश अधिकारियों के नियंत्रण में बनी रहीं।
1765 → बंगाल में Dual Government → रॉबर्ट क्लाइव
1919 Act → प्रांतों में Dyarchy
खिलाफत आंदोलन
प्रथम विश्व युद्ध के बाद तुर्की के सुल्तान और खिलाफत के भविष्य को लेकर भारतीय मुसलमानों के एक वर्ग में असंतोष बढ़ा। भारत में शुरू हुए खिलाफत आंदोलन के प्रमुख नेताओं में मोहम्मद अली और शौकत अली शामिल थे, जिन्हें अली बंधु कहा जाता है।
गांधीजी ने खिलाफत आंदोलन का समर्थन किया और इसे ब्रिटिश शासन के विरुद्ध व्यापक असहयोग आंदोलन से जोड़ने का प्रयास किया।
- खिलाफत आंदोलन के प्रमुख नेताओं में मोहम्मद अली और शौकत अली थे।
- दोनों को अली बंधु कहा जाता है।
- महात्मा गांधी ने खिलाफत आंदोलन का समर्थन किया।
असहयोग आंदोलन 1920–1922
असहयोग आंदोलन (Non-Cooperation Movement) गांधीजी के नेतृत्व में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध पहला बड़ा राष्ट्रव्यापी जन आंदोलन था। कांग्रेस ने 1920 में असहयोग कार्यक्रम को स्वीकार किया।
आंदोलन की पृष्ठभूमि में रॉलेट एक्ट, जलियांवाला बाग हत्याकांड और खिलाफत प्रश्न जैसी घटनाएं महत्वपूर्ण थीं।
असहयोग आंदोलन के प्रमुख कार्यक्रम
- सरकारी उपाधियों और सम्मान का त्याग।
- सरकारी शिक्षण संस्थानों का बहिष्कार।
- कानूनी और सरकारी संस्थाओं से असहयोग।
- विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार।
- खादी और स्वदेशी वस्तुओं को प्रोत्साहन।
चौरी-चौरा की घटना
5 फरवरी 1922 को उत्तर प्रदेश के चौरी-चौरा में प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच संघर्ष हिंसक हो गया। प्रदर्शनकारियों ने पुलिस थाने में आग लगा दी और कई पुलिसकर्मियों की मृत्यु हुई।
गांधीजी अहिंसक आंदोलन के सिद्धांत पर दृढ़ थे। इस घटना के बाद उन्होंने असहयोग आंदोलन वापस लेने का निर्णय किया।
- असहयोग आंदोलन 1920 ई. में शुरू हुआ।
- इसका नेतृत्व महात्मा गांधी ने किया।
- आंदोलन में विदेशी वस्त्रों के बहिष्कार और खादी को प्रोत्साहन दिया गया।
- चौरी-चौरा की घटना 5 फरवरी 1922 को हुई।
- चौरी-चौरा की हिंसक घटना के बाद गांधीजी ने असहयोग आंदोलन वापस ले लिया।
1906 → मुस्लिम लीग | 1909 → मार्ले-मिंटो सुधार | 1915 → गांधीजी भारत लौटे | 1916 → होमरूल + लखनऊ समझौता | 1917 → चंपारण | 1918 → अहमदाबाद + खेड़ा | 1919 → रॉलेट एक्ट + जलियांवाला बाग | 1920 → असहयोग आंदोलन | 1922 → चौरी-चौरा
स्वराज पार्टी की स्थापना
असहयोग आंदोलन की वापसी के बाद कांग्रेस के भीतर आगे की रणनीति को लेकर मतभेद उभरे। चित्तरंजन दास और मोतीलाल नेहरू विधान परिषदों में प्रवेश करके ब्रिटिश शासन की नीतियों का भीतर से विरोध करने के पक्ष में थे।
इसी उद्देश्य से 1923 ई. में स्वराज पार्टी (Swaraj Party) की स्थापना की गई। चित्तरंजन दास इसके अध्यक्ष और मोतीलाल नेहरू प्रमुख नेताओं में से एक थे।
साइमन कमीशन
ब्रिटिश सरकार ने 1919 के संवैधानिक सुधारों की समीक्षा के लिए 1927 ई. में साइमन कमीशन नियुक्त किया। इसके अध्यक्ष सर जॉन साइमन थे।
आयोग में एक भी भारतीय सदस्य नहीं था। इसी कारण भारत में इसका व्यापक विरोध हुआ। साइमन कमीशन 1928 ई. में भारत पहुंचा और उसके विरोध में “Simon Go Back” का नारा लोकप्रिय हुआ।
लाला लाजपत राय और साइमन कमीशन
लाहौर में साइमन कमीशन के विरोध में हुए प्रदर्शन का नेतृत्व लाला लाजपत राय ने किया। प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने लाठीचार्ज किया, जिसमें वे गंभीर रूप से घायल हुए। कुछ समय बाद नवंबर 1928 में उनकी मृत्यु हो गई।
- साइमन कमीशन की नियुक्ति 1927 ई. में हुई।
- इसके अध्यक्ष सर जॉन साइमन थे।
- आयोग में कोई भारतीय सदस्य नहीं था।
- साइमन कमीशन 1928 ई. में भारत आया।
- इसके विरोध से “Simon Go Back” का नारा जुड़ा है।
नेहरू रिपोर्ट 1928
भारतीय नेताओं ने संवैधानिक सुधारों के लिए अपना प्रस्ताव तैयार करने का प्रयास किया। इसके लिए मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में एक समिति बनाई गई।
समिति ने 1928 ई. में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की, जिसे नेहरू रिपोर्ट (Nehru Report) कहा जाता है। इसमें भारत के लिए डोमिनियन स्टेटस की मांग प्रमुख रूप से की गई थी।
नेहरू रिपोर्ट → मोतीलाल नेहरू → 1928
इसे जवाहरलाल नेहरू की रिपोर्ट समझने की गलती न करें।
लाहौर अधिवेशन 1929 और पूर्ण स्वराज
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का ऐतिहासिक लाहौर अधिवेशन दिसंबर 1929 में आयोजित हुआ। इसकी अध्यक्षता जवाहरलाल नेहरू ने की।
इस अधिवेशन में कांग्रेस ने पूर्ण स्वराज (Purna Swaraj) को अपना लक्ष्य घोषित किया। इसके बाद 26 जनवरी 1930 को पूरे देश में स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाने का आह्वान किया गया।
- लाहौर अधिवेशन 1929 ई. में हुआ।
- इसके अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू थे।
- कांग्रेस ने पूर्ण स्वराज को अपना लक्ष्य घोषित किया।
- 26 जनवरी 1930 को स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाया गया।
सविनय अवज्ञा आंदोलन
पूर्ण स्वराज की घोषणा के बाद गांधीजी के नेतृत्व में सविनय अवज्ञा आंदोलन (Civil Disobedience Movement) शुरू किया गया। इसका उद्देश्य ब्रिटिश शासन के अन्यायपूर्ण कानूनों का अहिंसक तरीके से उल्लंघन करना था।
आंदोलन की शुरुआत नमक कानून के विरोध से हुई। गांधीजी ने साबरमती आश्रम से दांडी तक यात्रा करके नमक कानून तोड़ने का निर्णय लिया।
दांडी मार्च 1930
गांधीजी ने 12 मार्च 1930 को साबरमती आश्रम से अपने साथियों के साथ दांडी की ओर यात्रा शुरू की। लगभग 24 दिनों की यात्रा के बाद वे गुजरात के समुद्र तट पर स्थित दांडी पहुंचे।
6 अप्रैल 1930 को गांधीजी ने दांडी में नमक बनाकर ब्रिटिश नमक कानून का उल्लंघन किया। इसके साथ सविनय अवज्ञा आंदोलन ने व्यापक जन आंदोलन का रूप ले लिया।
- दांडी मार्च 12 मार्च 1930 को शुरू हुआ।
- यात्रा साबरमती आश्रम से शुरू हुई।
- गांधीजी ने 6 अप्रैल 1930 को दांडी में नमक कानून तोड़ा।
- दांडी मार्च का संबंध सविनय अवज्ञा आंदोलन से है।
गोलमेज सम्मेलन
भारत के संवैधानिक भविष्य पर चर्चा के लिए ब्रिटिश सरकार ने लंदन में तीन गोलमेज सम्मेलन (Round Table Conferences) आयोजित किए।
| सम्मेलन | अवधि / वर्ष | महत्वपूर्ण तथ्य |
|---|---|---|
| प्रथम गोलमेज सम्मेलन | 1930–1931 | कांग्रेस ने भाग नहीं लिया |
| द्वितीय गोलमेज सम्मेलन | 1931 | गांधीजी ने कांग्रेस का प्रतिनिधित्व किया |
| तृतीय गोलमेज सम्मेलन | 1932 | कांग्रेस ने भाग नहीं लिया |
महात्मा गांधी केवल द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में शामिल हुए।
गांधी-इरविन समझौता 1931
सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान गांधीजी और तत्कालीन वायसराय लॉर्ड इरविन के बीच बातचीत हुई। इसके परिणामस्वरूप 5 मार्च 1931 को गांधी-इरविन समझौता हुआ।
समझौते के बाद कांग्रेस ने सविनय अवज्ञा आंदोलन को अस्थायी रूप से स्थगित किया और गांधीजी कांग्रेस के प्रतिनिधि के रूप में द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने लंदन गए।
1930 → दांडी मार्च | 1931 → गांधी-इरविन समझौता | 1931 → द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में गांधीजी
कराची अधिवेशन 1931
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का कराची अधिवेशन 1931 आधुनिक भारतीय इतिहास में विशेष महत्व रखता है। इसकी अध्यक्षता सरदार वल्लभभाई पटेल ने की।
इस अधिवेशन में मौलिक अधिकारों और राष्ट्रीय आर्थिक कार्यक्रम से संबंधित महत्वपूर्ण प्रस्ताव स्वीकार किए गए। स्वतंत्र भारत की भावी राजनीतिक और आर्थिक दिशा के संदर्भ में इन प्रस्तावों का विशेष महत्व था।
भगत सिंह और क्रांतिकारी आंदोलन
राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान क्रांतिकारी गतिविधियों ने भी ब्रिटिश शासन के विरुद्ध संघर्ष में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, सुखदेव और राजगुरु इस धारा के प्रमुख क्रांतिकारियों में शामिल थे।
1928 में लाला लाजपत राय की मृत्यु के बाद भगत सिंह, राजगुरु और उनके साथियों ने ब्रिटिश पुलिस अधिकारी जे. पी. सॉन्डर्स की हत्या की।
8 अप्रैल 1929 को भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने केंद्रीय विधान सभा में बम फेंके। उनका उद्देश्य जानलेवा हमला करना नहीं, बल्कि अपनी राजनीतिक आवाज को व्यापक रूप से सामने लाना था।
23 मार्च 1931 को भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को लाहौर षड्यंत्र मामले में फांसी दी गई।
- केंद्रीय विधान सभा बम कांड 8 अप्रैल 1929 को हुआ।
- इसमें भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त शामिल थे।
- भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को 23 मार्च 1931 को फांसी दी गई।
सांप्रदायिक पुरस्कार और पूना समझौता
ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैम्जे मैकडोनाल्ड ने 1932 ई. में Communal Award की घोषणा की। इसमें विभिन्न समुदायों के लिए पृथक प्रतिनिधित्व की व्यवस्था का विस्तार किया गया और दलित वर्गों के लिए भी पृथक निर्वाचन का प्रस्ताव रखा गया।
महात्मा गांधी ने दलित वर्गों के लिए पृथक निर्वाचन का विरोध किया। इसके बाद गांधीजी और डॉ. भीमराव आंबेडकर के बीच बातचीत हुई।
पूना समझौता 1932
24 सितंबर 1932 को पूना समझौता (Poona Pact) हुआ। इसके तहत दलित वर्गों के लिए पृथक निर्वाचन के स्थान पर संयुक्त निर्वाचन व्यवस्था के भीतर प्रांतीय विधानसभाओं में आरक्षित सीटों की व्यवस्था पर सहमति बनी।
- Communal Award की घोषणा रैम्जे मैकडोनाल्ड ने की।
- पूना समझौता 1932 ई. में हुआ।
- यह समझौता गांधीजी और डॉ. बी. आर. आंबेडकर के बीच हुए समझौते का परिणाम था।
- इसका प्रमुख मुद्दा दलित वर्गों का राजनीतिक प्रतिनिधित्व था।
भारत शासन अधिनियम 1935
Government of India Act 1935 ब्रिटिश शासन के दौरान पारित सबसे विस्तृत संवैधानिक अधिनियमों में से एक था। इसने भारत की प्रशासनिक और संवैधानिक व्यवस्था में कई महत्वपूर्ण परिवर्तन प्रस्तावित किए।
भारत शासन अधिनियम 1935 की प्रमुख विशेषताएं
- प्रांतीय स्वायत्तता की व्यवस्था की गई।
- प्रांतों में 1919 से चली आ रही द्वैध शासन व्यवस्था समाप्त की गई।
- एक अखिल भारतीय संघ की परिकल्पना की गई, हालांकि वह लागू नहीं हो सका।
- केंद्र में द्वैध शासन का प्रावधान किया गया, लेकिन यह लागू नहीं हुआ।
- संघीय, प्रांतीय और समवर्ती सूचियों के माध्यम से विषयों का विभाजन किया गया।
- मताधिकार का विस्तार किया गया, हालांकि यह सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार नहीं था।
1937 के प्रांतीय चुनाव
भारत शासन अधिनियम 1935 के प्रावधानों के आधार पर 1937 ई. में प्रांतीय चुनाव आयोजित किए गए। कांग्रेस ने कई प्रांतों में अच्छा प्रदर्शन किया और अंततः अनेक प्रांतों में कांग्रेस मंत्रिमंडल बने।
- भारत शासन अधिनियम 1935 ई. में पारित हुआ।
- इसकी प्रमुख विशेषता प्रांतीय स्वायत्तता थी।
- प्रांतों में द्वैध शासन समाप्त किया गया।
- इसके आधार पर 1937 ई. में प्रांतीय चुनाव हुए।
- प्रस्तावित अखिल भारतीय संघ लागू नहीं हो सका।
1923–1937 : Quick Revision
1923 → स्वराज पार्टी | 1927 → साइमन कमीशन नियुक्त | 1928 → साइमन कमीशन भारत आया + नेहरू रिपोर्ट | 1929 → लाहौर अधिवेशन + पूर्ण स्वराज | 1930 → दांडी मार्च + सविनय अवज्ञा आंदोलन | 1931 → गांधी-इरविन समझौता | 1931 → द्वितीय गोलमेज सम्मेलन | 1932 → पूना समझौता | 1935 → भारत शासन अधिनियम | 1937 → प्रांतीय चुनाव
द्वितीय विश्व युद्ध और भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन
सितंबर 1939 में द्वितीय विश्व युद्ध शुरू हुआ। ब्रिटिश सरकार ने भारतीय नेताओं से परामर्श किए बिना भारत को भी युद्ध में शामिल घोषित कर दिया। कांग्रेस ने इस निर्णय का विरोध किया।
युद्ध के उद्देश्यों और भारत की स्वतंत्रता के संबंध में स्पष्ट आश्वासन न मिलने के कारण 1939 ई. में विभिन्न प्रांतों के कांग्रेस मंत्रिमंडलों ने इस्तीफा दे दिया।
- द्वितीय विश्व युद्ध 1939 ई. में शुरू हुआ।
- भारत को ब्रिटिश सरकार ने युद्ध में शामिल घोषित किया।
- कांग्रेस मंत्रिमंडलों ने 1939 ई. में इस्तीफा दिया।
अगस्त प्रस्ताव 1940
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान भारतीयों का सहयोग प्राप्त करने के उद्देश्य से वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो ने 8 अगस्त 1940 को अगस्त प्रस्ताव (August Offer) की घोषणा की।
इसमें युद्ध के बाद भारतीयों को अपना संविधान तैयार करने की दिशा में अधिक भूमिका देने तथा वायसराय की कार्यकारिणी परिषद का विस्तार करने जैसी बातें शामिल थीं। कांग्रेस इस प्रस्ताव से संतुष्ट नहीं हुई।
व्यक्तिगत सत्याग्रह 1940
अगस्त प्रस्ताव से असंतुष्ट होने के बाद गांधीजी ने व्यक्तिगत सत्याग्रह (Individual Satyagraha) शुरू किया। इसका उद्देश्य युद्ध के विरुद्ध शांतिपूर्ण तरीके से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार को सामने रखना था।
विनोबा भावे व्यक्तिगत सत्याग्रह के प्रथम सत्याग्रही चुने गए। जवाहरलाल नेहरू दूसरे प्रमुख सत्याग्रही थे।
प्रथम व्यक्तिगत सत्याग्रही → विनोबा भावे
द्वितीय व्यक्तिगत सत्याग्रही → जवाहरलाल नेहरू
क्रिप्स मिशन 1942
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश सरकार ने भारत में राजनीतिक गतिरोध दूर करने और भारतीय सहयोग प्राप्त करने के उद्देश्य से सर स्टैफर्ड क्रिप्स को भारत भेजा। इसे क्रिप्स मिशन कहा जाता है।
क्रिप्स मिशन मार्च 1942 में भारत आया। इसके प्रस्तावों में युद्ध समाप्त होने के बाद भारत को डोमिनियन स्टेटस देने और संविधान निर्माण की व्यवस्था करने की बात शामिल थी।
कांग्रेस सहित प्रमुख भारतीय राजनीतिक शक्तियों ने इन प्रस्तावों को स्वीकार नहीं किया। क्रिप्स मिशन की विफलता के बाद ब्रिटिश शासन के विरुद्ध निर्णायक आंदोलन की मांग और मजबूत हुई।
- क्रिप्स मिशन भारत 1942 ई. में आया।
- इसका नेतृत्व सर स्टैफर्ड क्रिप्स ने किया।
- इसके प्रस्ताव भारतीय राजनीतिक दलों को स्वीकार्य नहीं हुए।
- क्रिप्स मिशन की विफलता के बाद भारत छोड़ो आंदोलन की पृष्ठभूमि मजबूत हुई।
भारत छोड़ो आंदोलन 1942
क्रिप्स मिशन की विफलता के बाद कांग्रेस ने ब्रिटिश शासन को समाप्त करने के लिए एक व्यापक जन आंदोलन शुरू करने का निर्णय लिया। 8 अगस्त 1942 को बंबई में अखिल भारतीय कांग्रेस समिति ने ऐतिहासिक भारत छोड़ो प्रस्ताव स्वीकार किया।
गांधीजी ने इस अवसर पर “करो या मरो” (Do or Die) का संदेश दिया। भारत छोड़ो आंदोलन को August Movement भी कहा जाता है।
9 अगस्त 1942 की सुबह गांधीजी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल और कांग्रेस के अन्य प्रमुख नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। नेताओं की गिरफ्तारी के बावजूद आंदोलन देश के अनेक क्षेत्रों में फैल गया।
भारत छोड़ो आंदोलन की विशेषताएं
- भारत छोड़ो प्रस्ताव 8 अगस्त 1942 को स्वीकार किया गया।
- प्रमुख केंद्र बंबई का ग्वालिया टैंक मैदान था।
- गांधीजी ने “करो या मरो” का संदेश दिया।
- 9 अगस्त को कांग्रेस के प्रमुख नेताओं को गिरफ्तार किया गया।
- युवाओं, छात्रों, किसानों और अन्य समूहों ने आंदोलन में भाग लिया।
अरुणा आसफ अली
अरुणा आसफ अली ने 9 अगस्त 1942 को बंबई के ग्वालिया टैंक मैदान में कांग्रेस का झंडा फहराया। भारत छोड़ो आंदोलन में उनकी भूमिका के कारण वे इस आंदोलन की प्रमुख महिला नेताओं में गिनी जाती हैं।
भूमिगत आंदोलन
प्रमुख नेताओं की गिरफ्तारी के बाद कई राष्ट्रवादी कार्यकर्ताओं ने भूमिगत रहकर आंदोलन जारी रखा। जयप्रकाश नारायण, राम मनोहर लोहिया और उषा मेहता जैसे नेताओं और कार्यकर्ताओं ने इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
उषा मेहता भूमिगत कांग्रेस रेडियो से विशेष रूप से जुड़ी थीं, जिसके माध्यम से आंदोलन से संबंधित संदेशों और समाचारों का प्रसारण किया जाता था।
- भारत छोड़ो आंदोलन 1942 ई. में शुरू हुआ।
- भारत छोड़ो प्रस्ताव 8 अगस्त 1942 को पारित हुआ।
- “करो या मरो” का नारा गांधीजी से संबंधित है।
- अरुणा आसफ अली ने ग्वालिया टैंक मैदान में झंडा फहराया।
- उषा मेहता का संबंध कांग्रेस रेडियो से था।
सुभाष चंद्र बोस और आजाद हिंद फौज
सुभाष चंद्र बोस भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के प्रमुख राष्ट्रवादी नेताओं में से एक थे। वे 1938 के हरिपुरा अधिवेशन में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए।
1939 में वे त्रिपुरी अधिवेशन के समय पुनः कांग्रेस अध्यक्ष चुने गए, लेकिन कांग्रेस नेतृत्व के एक वर्ग के साथ मतभेदों के कारण बाद में उन्होंने अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया।
इसके बाद उन्होंने 1939 ई. में फॉरवर्ड ब्लॉक (Forward Bloc) की स्थापना की।
1938 → हरिपुरा → सुभाष चंद्र बोस | 1939 → त्रिपुरी अधिवेशन | 1939 → Forward Bloc
आजाद हिंद फौज – INA
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान दक्षिण-पूर्व एशिया में भारतीय युद्धबंदियों और प्रवासी भारतीयों की सहायता से Indian National Army (INA) का गठन किया गया। इसके प्रारंभिक संगठन में मोहन सिंह की महत्वपूर्ण भूमिका थी।
बाद में सुभाष चंद्र बोस ने आजाद हिंद फौज का नेतृत्व संभाला और इसे भारतीय स्वतंत्रता के लिए एक संगठित सैन्य शक्ति के रूप में पुनर्गठित किया।
आजाद हिंद सरकार
सुभाष चंद्र बोस ने 21 अक्टूबर 1943 को सिंगापुर में आजाद हिंद की अस्थायी सरकार (Provisional Government of Azad Hind) की स्थापना की घोषणा की।
INA की महिला रेजिमेंट को रानी झांसी रेजिमेंट कहा गया और इसका नेतृत्व कैप्टन लक्ष्मी सहगल ने किया।
- Forward Bloc की स्थापना सुभाष चंद्र बोस ने की।
- INA के प्रारंभिक गठन से मोहन सिंह जुड़े थे।
- सुभाष चंद्र बोस ने बाद में INA का नेतृत्व संभाला।
- आजाद हिंद की अस्थायी सरकार की घोषणा 1943 ई. में हुई।
- रानी झांसी रेजिमेंट का नेतृत्व लक्ष्मी सहगल ने किया।
आजाद हिंद फौज के मुकदमे
द्वितीय विश्व युद्ध समाप्त होने के बाद ब्रिटिश सरकार ने आजाद हिंद फौज के अधिकारियों पर मुकदमे चलाए। प्रसिद्ध INA Trials दिल्ली के लाल किले में आयोजित किए गए।
पहले प्रमुख मुकदमे में शाहनवाज खान, प्रेम कुमार सहगल और गुरबख्श सिंह ढिल्लों पर मुकदमा चलाया गया। इन मुकदमों ने पूरे देश में व्यापक जनसमर्थन और राष्ट्रवादी भावनाएं उत्पन्न कीं।
INA Trials → लाल किला
शाहनवाज खान + पी. के. सहगल + जी. एस. ढिल्लों
रॉयल इंडियन नेवी विद्रोह 1946
फरवरी 1946 में Royal Indian Navy के भारतीय नौसैनिकों ने खराब भोजन, सेवा की परिस्थितियों, नस्लीय भेदभाव और अन्य शिकायतों को लेकर विद्रोह किया।
इसकी शुरुआत बंबई में हुई और आंदोलन अन्य नौसैनिक प्रतिष्ठानों तक फैल गया। इस घटना ने ब्रिटिश सरकार के सामने भारतीय सशस्त्र बलों में बढ़ते असंतोष को स्पष्ट रूप से सामने रखा।
कैबिनेट मिशन 1946
ब्रिटिश सरकार ने भारत में सत्ता हस्तांतरण और संविधान निर्माण से संबंधित समाधान खोजने के लिए 1946 ई. में तीन सदस्यीय कैबिनेट मिशन भारत भेजा।
इसके सदस्य लॉर्ड पैथिक लॉरेंस, सर स्टैफर्ड क्रिप्स और ए. वी. एलेक्जेंडर थे।
कैबिनेट मिशन ने भारत के लिए एक संघीय ढांचे और संविधान सभा के गठन से संबंधित योजना प्रस्तुत की। इसके आधार पर संविधान सभा के गठन की प्रक्रिया आगे बढ़ी।
| सदस्य | पद / पहचान |
|---|---|
| लॉर्ड पैथिक लॉरेंस | भारत सचिव |
| सर स्टैफर्ड क्रिप्स | ब्रिटिश कैबिनेट सदस्य |
| ए. वी. एलेक्जेंडर | ब्रिटिश कैबिनेट सदस्य |
- कैबिनेट मिशन भारत 1946 ई. में आया।
- कैबिनेट मिशन में तीन सदस्य थे।
- इसका संबंध सत्ता हस्तांतरण और संविधान सभा की योजना से था।
प्रत्यक्ष कार्रवाई दिवस 1946
कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच राजनीतिक मतभेद बढ़ने के बीच मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान की मांग के समर्थन में 16 अगस्त 1946 को Direct Action Day मनाने का आह्वान किया।
कलकत्ता में इस दौरान भीषण सांप्रदायिक हिंसा हुई। इसके बाद देश के अन्य क्षेत्रों में भी सांप्रदायिक तनाव और हिंसा बढ़ी।
अंतरिम सरकार 1946
सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया के दौरान 2 सितंबर 1946 को भारत में अंतरिम सरकार का गठन हुआ। जवाहरलाल नेहरू वायसराय की कार्यकारिणी परिषद के उपाध्यक्ष बने और व्यवहार में अंतरिम सरकार के प्रमुख की भूमिका निभाई।
मुस्लिम लीग ने प्रारंभ में इसमें भाग नहीं लिया, लेकिन बाद में उसके प्रतिनिधि भी अंतरिम सरकार में शामिल हुए।
संविधान सभा की पहली बैठक
भारत की संविधान सभा की पहली बैठक 9 दिसंबर 1946 को हुई। डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा को अस्थायी अध्यक्ष बनाया गया।
इसके बाद डॉ. राजेंद्र प्रसाद संविधान सभा के स्थायी अध्यक्ष चुने गए। संविधान सभा ने आगे चलकर स्वतंत्र भारत के संविधान का निर्माण किया।
- संविधान सभा की पहली बैठक 9 दिसंबर 1946 को हुई।
- अस्थायी अध्यक्ष डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा थे।
- स्थायी अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद चुने गए।
माउंटबेटन योजना 1947
लॉर्ड माउंटबेटन मार्च 1947 में भारत के अंतिम वायसराय बने। उस समय भारत में सत्ता हस्तांतरण और सांप्रदायिक समस्या का समाधान ब्रिटिश सरकार के सामने सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न था।
3 जून 1947 को माउंटबेटन योजना की घोषणा की गई। इसमें ब्रिटिश भारत के विभाजन और भारत तथा पाकिस्तान के रूप में दो डोमिनियन बनाने की योजना स्वीकार की गई।
लॉर्ड माउंटबेटन → भारत के अंतिम वायसराय
3 जून 1947 → माउंटबेटन योजना
भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947
माउंटबेटन योजना के आधार पर ब्रिटिश संसद ने Indian Independence Act 1947 पारित किया। इसे जुलाई 1947 में ब्रिटिश सम्राट की स्वीकृति मिली।
अधिनियम के अनुसार 15 अगस्त 1947 से भारत और पाकिस्तान दो स्वतंत्र डोमिनियन बनने थे और भारत पर ब्रिटिश शासन समाप्त होना था।
भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम की प्रमुख विशेषताएं
- ब्रिटिश भारत को दो डोमिनियन में विभाजित किया गया।
- भारत और पाकिस्तान के लिए अलग-अलग संविधान सभाओं की व्यवस्था हुई।
- ब्रिटिश संसद का भारत पर विधायी नियंत्रण समाप्त हुआ।
- देशी रियासतों पर ब्रिटिश सर्वोच्चता समाप्त हो गई।
- नए डोमिनियनों को अपने संवैधानिक भविष्य का निर्धारण करने का अधिकार मिला।
भारत की स्वतंत्रता – 15 अगस्त 1947
लंबे राष्ट्रीय आंदोलन और अनेक राजनीतिक संघर्षों के बाद 15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ और ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन का अंत हुआ।
जवाहरलाल नेहरू स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री बने। लॉर्ड माउंटबेटन स्वतंत्र भारत के पहले गवर्नर-जनरल बने।
इसके बाद सी. राजगोपालाचारी भारत के पहले भारतीय गवर्नर-जनरल बने।
1939–1947 : Quick Revision
| वर्ष | महत्वपूर्ण घटना |
|---|---|
| 1939 | द्वितीय विश्व युद्ध एवं कांग्रेस मंत्रिमंडलों का इस्तीफा |
| 1940 | अगस्त प्रस्ताव और व्यक्तिगत सत्याग्रह |
| 1942 | क्रिप्स मिशन और भारत छोड़ो आंदोलन |
| 1943 | आजाद हिंद की अस्थायी सरकार |
| 1945–46 | INA Trials |
| 1946 | नौसेना विद्रोह, कैबिनेट मिशन और अंतरिम सरकार |
| 1946 | संविधान सभा की पहली बैठक |
| 3 जून 1947 | माउंटबेटन योजना |
| जुलाई 1947 | भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम |
| 15 अगस्त 1947 | भारत स्वतंत्र हुआ |
1940 → अगस्त प्रस्ताव | 1942 → क्रिप्स मिशन | 1942 → भारत छोड़ो आंदोलन | 1943 → आजाद हिंद सरकार | 1946 → कैबिनेट मिशन | 1946 → अंतरिम सरकार | 1946 → संविधान सभा | 3 जून 1947 → माउंटबेटन योजना | 15 अगस्त 1947 → स्वतंत्रता
आधुनिक भारत का इतिहास – Quick Revision
परीक्षा से पहले Modern History in Hindi के महत्वपूर्ण तथ्यों को दोहराने के लिए नीचे प्रमुख घटनाओं को क्रमवार दिया गया है।
| वर्ष | महत्वपूर्ण घटना |
|---|---|
| 1498 | वास्को-दा-गामा का कालीकट आगमन |
| 1757 | प्लासी का युद्ध |
| 1764 | बक्सर का युद्ध |
| 1765 | बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी |
| 1773 | रेगुलेटिंग एक्ट |
| 1793 | स्थायी बंदोबस्त |
| 1829 | सती प्रथा पर प्रतिबंध |
| 1853 | भारत में पहली यात्री रेल |
| 1857 | 1857 का विद्रोह |
| 1858 | ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन का अंत |
| 1885 | भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना |
| 1905 | बंगाल विभाजन और स्वदेशी आंदोलन |
| 1906 | मुस्लिम लीग की स्थापना |
| 1915 | महात्मा गांधी का भारत आगमन |
| 1917 | चंपारण सत्याग्रह |
| 1919 | रॉलेट एक्ट और जलियांवाला बाग हत्याकांड |
| 1920 | असहयोग आंदोलन |
| 1928 | साइमन कमीशन का भारत आगमन |
| 1929 | लाहौर अधिवेशन और पूर्ण स्वराज |
| 1930 | दांडी मार्च और सविनय अवज्ञा आंदोलन |
| 1932 | पूना समझौता |
| 1935 | भारत शासन अधिनियम |
| 1942 | क्रिप्स मिशन और भारत छोड़ो आंदोलन |
| 1943 | आजाद हिंद की अस्थायी सरकार |
| 1946 | कैबिनेट मिशन और अंतरिम सरकार |
| 1947 | भारत की स्वतंत्रता |
आधुनिक इतिहास के महत्वपूर्ण तथ्य
- प्लासी का युद्ध – 1757 ई.
- बक्सर का युद्ध – 1764 ई.
- सती प्रथा पर प्रतिबंध – 1829 ई.
- पहली यात्री रेल – बंबई से ठाणे, 1853 ई.
- 1857 का व्यापक विद्रोह – मेरठ से 10 मई 1857
- कांग्रेस की स्थापना – 1885 ई.
- बंगाल विभाजन – 1905 ई.
- चंपारण सत्याग्रह – 1917 ई.
- जलियांवाला बाग हत्याकांड – 13 अप्रैल 1919
- असहयोग आंदोलन – 1920 ई.
- पूर्ण स्वराज – लाहौर अधिवेशन, 1929
- दांडी मार्च – 12 मार्च 1930 से प्रारंभ
- भारत छोड़ो आंदोलन – 1942 ई.
- भारतीय स्वतंत्रता – 15 अगस्त 1947
आधुनिक इतिहास के 10 महत्वपूर्ण प्रश्न
नीचे दिए गए प्रश्न SSC, Railway, State PSC तथा अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए उपयोगी हैं।
Q1. प्लासी का युद्ध किस वर्ष हुआ था?
A. 1757 ई.
B. 1764 ई.
C. 1765 ई.
D. 1773 ई.
उत्तर देखें
प्लासी का युद्ध 23 जून 1757 को अंग्रेजों और सिराजुद्दौला की सेना के बीच हुआ था।
Q2. बक्सर का युद्ध कब हुआ था?
A. 1756 ई.
B. 1757 ई.
C. 1764 ई.
D. 1765 ई.
उत्तर देखें
बक्सर का युद्ध 1764 ई. में हुआ और इसने उत्तर भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी की राजनीतिक स्थिति को और मजबूत किया।
Q3. सती प्रथा को समाप्त करने के समय भारत का गवर्नर-जनरल कौन था?
A. लॉर्ड डलहौजी
B. लॉर्ड विलियम बेंटिंक
C. लॉर्ड कैनिंग
D. लॉर्ड कर्जन
उत्तर देखें
1829 ई. में बेंटिंक के शासनकाल में सती प्रथा को अवैध घोषित किया गया।
Q4. 1857 के विद्रोह की शुरुआत 10 मई 1857 को कहां से हुई?
A. दिल्ली
B. कानपुर
C. मेरठ
D. झांसी
उत्तर देखें
10 मई 1857 को मेरठ में व्यापक सैनिक विद्रोह शुरू हुआ, जिसके बाद विद्रोही दिल्ली पहुंचे।
Q5. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना किस वर्ष हुई?
A. 1885 ई.
B. 1905 ई.
C. 1906 ई.
D. 1911 ई.
उत्तर देखें
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का पहला अधिवेशन दिसंबर 1885 में बंबई में आयोजित हुआ था।
Q6. चंपारण सत्याग्रह का संबंध मुख्य रूप से किससे था?
A. कपड़ा मिल मजदूर
B. नील किसान
C. नमक कानून
D. वन कानून
उत्तर देखें
1917 का चंपारण सत्याग्रह नील की खेती से संबंधित किसानों की समस्याओं से जुड़ा था।
Q7. जलियांवाला बाग हत्याकांड कब हुआ था?
A. 13 अप्रैल 1919
B. 13 अप्रैल 1920
C. 5 फरवरी 1922
D. 12 मार्च 1930
उत्तर देखें
जलियांवाला बाग हत्याकांड अमृतसर में 13 अप्रैल 1919 को हुआ था।
Q8. दांडी मार्च किस आंदोलन से संबंधित था?
A. असहयोग आंदोलन
B. स्वदेशी आंदोलन
C. सविनय अवज्ञा आंदोलन
D. भारत छोड़ो आंदोलन
उत्तर देखें
गांधीजी ने 1930 में नमक कानून के विरोध में दांडी मार्च किया, जिसने सविनय अवज्ञा आंदोलन को व्यापक गति दी।
Q9. “करो या मरो” का संदेश किस आंदोलन से संबंधित है?
A. असहयोग आंदोलन
B. सविनय अवज्ञा आंदोलन
C. स्वदेशी आंदोलन
D. भारत छोड़ो आंदोलन
उत्तर देखें
गांधीजी ने अगस्त 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के समय “करो या मरो” का संदेश दिया।
Q10. भारत कब स्वतंत्र हुआ?
A. 26 जनवरी 1947
B. 15 अगस्त 1947
C. 26 जनवरी 1950
D. 9 दिसंबर 1946
उत्तर देखें
15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ और ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन का अंत हुआ।
आधुनिक इतिहास के MCQ हल करें
क्या आपने Modern History Notes पढ़ लिए हैं? अब परीक्षा की तैयारी मजबूत करने के लिए आधुनिक भारतीय इतिहास के महत्वपूर्ण MCQ Questions का अभ्यास करें।
Modern History MCQ in Hindi →Modern History in Hindi – FAQs
आधुनिक भारत का इतिहास कब से माना जाता है?
आधुनिक भारतीय इतिहास की समय-सीमा को अलग-अलग इतिहासकार अलग संदर्भों में निर्धारित करते हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं में सामान्यतः यूरोपीय शक्तियों के भारत आगमन, ब्रिटिश सत्ता के विस्तार और स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े विषय आधुनिक इतिहास के अंतर्गत पढ़े जाते हैं।
Modern History में प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए सबसे महत्वपूर्ण टॉपिक कौन से हैं?
प्लासी और बक्सर का युद्ध, ब्रिटिश प्रशासनिक नीतियां, 1857 का विद्रोह, सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, गांधी युग, क्रांतिकारी आंदोलन, सविनय अवज्ञा आंदोलन, भारत छोड़ो आंदोलन और स्वतंत्रता से जुड़ी घटनाएं विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं।
1857 की क्रांति कहां से शुरू हुई थी?
1857 का व्यापक सैनिक विद्रोह 10 मई 1857 को मेरठ से शुरू हुआ। इससे पहले 29 मार्च 1857 को बैरकपुर में मंगल पांडे से जुड़ी महत्वपूर्ण घटना हुई थी।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना कब हुई थी?
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना 1885 ई. में हुई। इसका पहला अधिवेशन बंबई में आयोजित हुआ और W. C. Bonnerjee इसके प्रथम अध्यक्ष थे।
भारत छोड़ो आंदोलन कब शुरू हुआ था?
भारत छोड़ो प्रस्ताव 8 अगस्त 1942 को बंबई में स्वीकार किया गया। इस आंदोलन के दौरान महात्मा गांधी ने “करो या मरो” का संदेश दिया।
Modern History की तैयारी कैसे करें?
सबसे पहले घटनाओं को कालक्रम में समझें। महत्वपूर्ण अधिनियम, आंदोलन, नेता और तिथियों के छोटे नोट्स बनाएं। इसके बाद नियमित रूप से MCQ अभ्यास और Quick Revision करें। इससे तथ्यों को लंबे समय तक याद रखना आसान होता है।
आधुनिक भारत का इतिहास (Modern History in Hindi) भारत में यूरोपीय शक्तियों के आगमन, ब्रिटिश सत्ता के विस्तार, सामाजिक-धार्मिक सुधारों और भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन से लेकर 1947 में स्वतंत्रता तक की महत्वपूर्ण घटनाओं को समझने में सहायता करता है।
SSC, Railway, UPSC, State PSC और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले विद्यार्थी महत्वपूर्ण घटनाओं को Timeline + Short Notes + MCQ Practice के माध्यम से दोहराएं। इससे Modern History के तथ्य और घटनाक्रम आसानी से याद किए जा सकते हैं।
पहले Concept पढ़ें → फिर Timeline दोहराएं → उसके बाद MCQ Practice करें → अंत में Quick Revision करें।
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